Thursday, November 7, 2013

कुछ केहते केहते

कुछ यादें तो ताज़ा हो गये
जो आप ऐसे कुछ कर गये
वो एक ज़माना था जो गुज़र गया
अब ये बाकी है, किसी और के इंतेज़ार मैं 

वो इतिहास के पन्नो को ना खोलना चाहूं अभी

दर्द देती है वो यादें
चल आज डूब जाते हैं कोई दूसरे नशे मैं
जहां छूना भी सके वो बात कभी 

मेरा आशियाँ आज रोशन किसी और के चराग से

वो साया बन के आये और दिल में समा गये
समझ के समझा रहा हूँ इस कमबख्त दिल को
पर ये दिल है की मानता ही नहीं 

ये इल्म तो मुझे मिल गये

जब वो दूर हुए थे हम से
ना खफा थे उनसे
बस अपने किस्मत को ही कोसते रेह गये 

ना कसूर था उसका

बस ये मेरा भरोसा ही था उसपे
वो तो अपना ठिकाना खुद ही ढूंड ली
हम बस अपना आशियाँ जला बैठे

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