Wednesday, July 17, 2013

इतिहास

कभी कुछ ख्वाब देखे थे मैने
रहेंगे हम उनके संग
ना हासिल हुआ उनका साथ
ना रेह पाये सफर मैं कभी हम
जुनून सा था दिल मैं
फितूर था दिमाग का
कुछ ….केह गये मुझसे 
पर समझा नहीं कभी
आज जल रहा है सीना
दूरी सही नहीं जाती 
जानते हैं कभी करीब ना आ सकेंगे
कट रही है ज़िंदगी बस याद मैं
और कोई खुस है अपनी ज़िंदगी के सौगात मैं.

1 comment:

  1. Very nice...Poetry in prose and prose in poetry...waah waah....

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